1. Hindi News
  2. Explainers
  3. EXCLUSIVE: 1 महीने में 2 मंत्री 'OUT', आखिर क्यों डगमगा रही नेपाल की Gen-Z सरकार? एक्सपर्ट से समझिए सबकुछ

EXCLUSIVE: 1 महीने में 2 मंत्री 'OUT', आखिर क्यों डगमगा रही नेपाल की Gen-Z सरकार? एक्सपर्ट से समझिए सबकुछ

 Written By: Vinay Trivedi
 Published : Apr 23, 2026 07:20 pm IST,  Updated : Apr 23, 2026 07:20 pm IST

Balen Shah Govt Crisis: नेपाल में बालेन शाह की Gen-Z सरकार अस्थिर नजर आ रही है। यहां सरकार का एक महीना पूरा होने से पहले ही दो मंत्रियों के इस्तीफे हो गए हैं। नेपाल में ऐसा क्यों हो रहा है, इसके बारे में साउथ एशिया मामलों के एक्सपर्ट डॉ. निहार आर. नायक से समझिए।

नेपाल में Gen-Z सरकार...- India TV Hindi
नेपाल में Gen-Z सरकार क्यों डगमगा रही है? Image Source : AP/PTI

Nepal Political Instability: नेपाल की सियासत इस समय अनिश्चितता और उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। 27 मार्च को सत्तारूढ़ हुई नई Gen-Z सरकार को अभी एक महीना भी पूरा नहीं हो पाया और उससे पहले ही गृहमंत्री समेत 2 मंत्रियों के इस्तीफे हो गए। इस घटनाक्रम ने कई बड़े प्रश्न खड़े कर दिए हैं। युवा लीडरशिप, Gen-Z आंदोलनों से पैदा हुई आशाएं और नेताओं के अनुभव की कमी को लेकर बहस तेज हो गई है। क्या यह अस्थिरता का संकेत है या बदलाव की शुरुआत? इन्हीं खास मुद्दों पर INDIA TV ने साउथ एशिया मामलों के एक्सपर्ट और MP-IDSA के रिसर्च फेलो डॉ. निहार आर. नायक से खास बातचीत की।

सवाल- 27 मार्च को नेपाल में बालेन शाह सरकार का गठन हुआ और 1 महीना पूरा होने से पहले दो मंत्री सुदन गुरुंग और दीपक कुमार साह हट चुके हैं। इस उथल-पुथल के पीछे आप बड़ा कारण क्या मानते हैं।

जवाब- डॉ. निहार आर. नायक ने कहा कि इस सरकार को बने अभी एक महीना भी नहीं हुआ है। इतनी जल्दी इस उथल-पुथल का कोई एक कारण बताना ठीक नहीं होगा, क्योंकि किसी भी सरकार को बदलाव लाने और उसका विश्लेषण करने के लिए कम से कम 90 दिन या एक साल का समय देना चाहिए। इतने कम समय में हुए बदलाव का सटीक कारण निकालना मुश्किल है।

उन्होंने कहा, 'अगर हम इस सरकार के गठन और उससे पहले हुए Gen-Z आंदोलन को जोड़कर देखें, तो स्थिति कुछ साफ होती है। इस आंदोलन को लेकर नेपाल और भारत दोनों जगह लोगों की राय बंटी हुई है। कुछ का मानना है कि इसमें बाहरी ताकतों का हाथ है, जबकि कुछ इसे घरेलू आंदोलन मानते हैं। अगर आप घटनाओं की कड़ी जोड़ें- जैसे कि पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का SCO मीटिंग में जाना और चीन की विक्ट्री परेड में शामिल होना और उसके ठीक एक हफ्ते बाद यह आंदोलन होना, तो बाहरी ताकतों की भूमिका का संदेह होता है।'

साउथ एशिया मामलों के एक्सपर्ट ने कहा कि नेपाल के लोग इस विषय पर खुलकर बोलने से डर रहे हैं। दो बातें बिल्कुल स्पष्ट हैं: पहली, सुशीला कार्की के नेतृत्व में बनी इस नई सरकार को पहली बार दलाई लामा ने बधाई दी, जो नेपाल के 70 साल के आधुनिक राजनीतिक इतिहास में कभी नहीं हुआ। दलाई लामा की इस दिलचस्पी ने चिंताएं बढ़ाई हैं। दूसरी, Gen-Z आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और तोड़फोड़ की जांच में नेपाल पुलिस ने पाया कि इसमें तिब्बती मूल के लोगों का हाथ हो सकता है। 'फ्री तिब्बत' आंदोलन से जुड़े लोगों की इसमें दिलचस्पी बाहरी हस्तक्षेप की ओर इशारा करती है। इसके अलावा, 'हामी नेपाल' (Hami Nepal) जैसे संगठनों को एक अमेरिकी एनजीओ से मिल रही फंडिंग भी इसी दिशा में संकेत करती है।

डॉ. निहार आर. नायक ने कहा कि इस उथल-पुथल का एक और बड़ा कारण लोगों की अत्यधिक उम्मीदें हैं। नेपाल के लोग सोच रहे हैं कि पीएम बालेन शाह के पास कोई जादू की छड़ी है जिससे रातों-रात विकास हो जाएगा, अर्थव्यवस्था सुधर जाएगी और नौकरियां मिल जाएंगी। लेकिन नेपाल की आर्थिक स्थिति फिलहाल अच्छी नहीं है। कोविड के बाद श्रीलंका, मालदीव और भूटान की तरह नेपाल की अर्थव्यवस्था भी कमजोर हुई है, क्योंकि ये देश दूसरों पर अत्यधिक निर्भर हैं।

उन्होंने कहा, 'जिन लोगों ने पिछली सरकारों पर भ्रष्टाचार और कुशासन का आरोप लगाकर प्रदर्शन किया था, वे खुद अब भ्रष्टाचार में घिरे हैं। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष रवि लामिछाने पर पासपोर्ट और कॉर्पोरेट घोटाले के मामले दर्ज हैं। श्रम मंत्री, जिन्हें इस्तीफा देना पड़ा, उनकी पत्नी भी भ्रष्टाचार में लिप्त पाई गईं। सुदन गुरुंग ने जिस दीपक भट्ट को गिरफ्तार किया था, उसी की कंपनी में निवेश किया और अपनी संपत्ति की घोषणा में उस राशि को छिपाया।'

साउथ एशिया मामलों के एक्सपर्ट ने कहा कि चुनाव के समय राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी में कई ऐसे लोग पैसे देकर शामिल हो गए जिनका कोई वैचारिक आधार नहीं था और उनकी पृष्ठभूमि भी संदिग्ध थी। बिना जांच-परख के ऐसे लोगों को टिकट दिया गया। अब यही सब बातें धीरे-धीरे सामने आ रही हैं, जो इस अस्थिरता का मुख्य कारण हैं। आगे चलकर ऐसे और भी मामले सामने आ सकते हैं।

सवाल- नेपाल की नई सरकार में ज्यादातर युवा, टेक्नोक्रेट या सिविल सोसाइटी से आए लोग हैं। क्या राजनीतिक अनुभव की कमी इस सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हो रही है?

जवाब- डॉ. निहार आर. नायक ने कहा कि यह एक बहुत स्पष्ट समस्या है। Gen-Z आंदोलन के बाद मैंने कई युवाओं और पार्टी कैडर से बात की। मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि इन युवाओं को सिर्फ सोशल मीडिया पर पोस्ट वायरल करना आता है। लेकिन नेपाल के संविधान, गवर्नेंस, प्रधानमंत्री कार्यालय के काम, मंत्रिपरिषद की भूमिका, विदेश नीति या पार्टी की विचारधारा के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है। ऐसे में वे सरकार कैसे चलाएंगे?

उन्होंने कहा, 'सिर्फ कम उम्र का होना या लोकप्रिय होना ही देश चलाने के लिए काफी नहीं होता। देश चलाना एक गंभीर काम है, यह कोई मजाक नहीं है। जैसे कोई कॉमेडियन या रैपर सिर्फ अपनी लोकप्रियता के दम पर बिना किसी अनुभव या शिक्षा के एक सफल राजनेता नहीं बन सकता। इसके लिए शिक्षा, अनुभव, समझ और परिपक्वता की आवश्यकता होती है।'

साउथ एशिया मामलों के एक्सपर्ट ने कहा कि उदाहरण के तौर पर, सत्ता में आते ही 24 घंटे के भीतर उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृह मंत्री को गिरफ्तार कर लिया। नेपाल की बार काउंसिल ने इसका विरोध किया क्योंकि उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था। नतीजतन, 15 दिन बाद अदालत ने उन्हें रिहा कर दिया। 

डॉ. निहार आर. नायक ने कहा, 'इन घटनाओं से पता चलता है कि उनमें परिपक्वता और प्रशासनिक अनुभव की कमी है। हालांकि समय के साथ वे सीख सकते हैं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि वे चुनाव के दौरान किए गए अपने वादों को पूरा कर पाएंगे। चुनावी घोषणापत्र में वादे करना और उन्हें लागू करना दो अलग-अलग बातें हैं। किसी भी योजना को लागू करने के लिए एक ठोस नीति, कुशल कर्मचारी और पर्याप्त संसाधनों की जरूरत होती है, और नेपाल सरकार के पास फिलहाल इन तीनों की कमी है। इसी अनुभवहीनता का नतीजा है कि महज 30 दिनों के भीतर सरकार के दो मंत्री इस्तीफा दे चुके हैं।'

सवाल- क्या 2025 के Gen-Z आंदोलनों के बाद पैदा हुई 'रातों-रात चमत्कार' की उम्मीदें मंत्रियों पर इतना दबाव बना रही हैं कि वे सिस्टम के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं?

जवाब- डॉ. निहार आर. नायक ने कहा कि नेपाल का समाज इस वक्त एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। नेपाल एक अल्पविकसित देश है, लेकिन यहां के लाखों युवा मलेशिया, गल्फ देशों, जापान, कोरिया, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित या तेजी से विकास कर रहे देशों में काम कर रहे हैं या पढ़ रहे हैं।

उन्होंने कहा कि नेपाल की राजनीति में इस प्रवासी आबादी का प्रभाव बहुत ज्यादा है। विदेशों में बैठे ये युवा वहां के विकास को देखकर नेपाल की तुलना करते हैं और अपने परिवारों को सरकार से वैसी ही मांगें करने के लिए कहते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि नेपाल के पास उन विकसित देशों जैसे संसाधन और कुशल कर्मचारी नहीं हैं। 

साउथ एशिया मामलों के एक्सपर्ट ने कहा कि नेपाल में मुख्य रूप से भारत और चीन ही निवेश करते हैं। भारत नेपाल का सबसे बड़ा निवेशक लगभग 33 प्रतिशत का रहा है और चीन पिछले 10-15 सालों से दूसरा बड़ा निवेशक बना है। चीन की निवेश नीति यह रही है कि जब काठमांडू में कोई वामपंथी सरकार होती है, तभी वे ज्यादा निवेश करते हैं। अगर सरकार भारत या अमेरिका समर्थक होती है तो चीन 'वेट एंड वॉच' की नीति अपनाता है और निवेश रोक देता है।

डॉ. निहार आर. नायक ने कहा, 'दूसरी ओर, भारतीय निवेशक भी नेपाल के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी FDI नियमों और पैसा वापस लाने में आने वाली तकनीकी दिक्कतों को लेकर चिंतित रहते हैं। 1990 के दशक में भारत सबसे बड़ा निवेशक था, लेकिन 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत में निवेश का माहौल बहुत बेहतर हो गया है। इसलिए भारतीय निवेशक नेपाल जाने के बजाय भारत में ही निवेश करना ज्यादा सुरक्षित मानते हैं।' 

उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका भी नेपाल में कोई बड़ा निवेश नहीं कर रहा है; वे सिर्फ आर्थिक मदद देते हैं और उन्होंने निवेश के लिए नीतियां बदलने की शर्त रखी है। इसलिए, विदेशों में बैठे नेपाली युवाओं की उम्मीदें और नेपाल की जमीनी हकीकत में बहुत बड़ा अंतर है। चाहे सरकार किसी की भी हो, उसे नेपाल की Geopolitics, संसाधनों की कमी और अपनी सीमाओं को समझना होगा। इस सरकार को दो-तिहाई बहुमत मिला है, जिससे जनता की उम्मीदें और भी बढ़ गई हैं। भारी उम्मीदों, अनुभव की कमी और संसाधनों के अभाव के कारण ही सरकार पर यह दबाव बन रहा है।

EXCLUSIVE
अभी और कितनी भीषण होगी मध्य-पूर्व की जंग, कब और कैसे होगा अंत? पढ़िए एक्सपर्ट का पूरा एनालिसिस
नक्सलवाद का खात्मा था कितना मुश्किल, सुरक्षा बलों ने जमीन पर झेलीं क्या-क्या मुश्किलें? सुनिए बस्तर IG की जुबानी
114 नए राफेल की डील से क्या खत्म हो जाएगा चीन-PAK के 'टू फ्रंट वॉर' का खतरा? एक्सपर्ट ने समझाया
बच्चे आज भी समझते हैं ड्यूटी पर हैं पिता, पुलवामा हमले के 7 साल बाद आज किस हाल में शहीद का परिवार? उनके छोटे भाई ने नम आंखों से बयां की दास्तान
प्रधानमंत्री का निष्कासन, हिंसा और फिर 1.5 साल में पारदर्शी चुनाव होकर नई का सरकार बनना बांग्लादेश के लिए कितनी बड़ी उपलब्धि? एक्सपर्ट से समझिए
भेदभाव रोकने वाले नियम खुद भेदभाव वाले कैसे? सुप्रीम कोर्ट में UGC नियमों के खिलाफ पक्ष रखने वाले वकील से समझें एक-एक बात
इनकम टैक्स नहीं भरते, फिर भी आपका बजट देखना क्यों है बहुत जरूरी? इकोनॉमिक एक्सपर्ट से समझें एक-एक बात
वेनेजुएला और अमेरिका के बीच तेल-ड्रग और घुसपैठियों ने कैसे कराई दुश्मनी? एक्सपर्ट से जानें सबकुछ
अल्पसंख्यकों पर नहीं थमा अत्याचार तो बांग्लादेश कैसे खो देगा अपना 'सुनहरा' भविष्य? एक्सपर्ट ने विस्तार से समझाया 
जहर उगलता था उस्मान हादी, 'ग्रेटर बांग्लादेश' का मैप भी इसी ने किया था जारी, एंटी इंडिया कैंपेन में कैसे था उसका अहम किरदार? पूर्व राजदूत से खास बातचीत में पढ़िए
बांग्लादेशी नेताओं की नॉर्थ ईस्ट छीनने की धमकी ‘शेख चिल्ली के सपनों’ जैसी या खतरनाक साजिश? पढ़िए विदेश मामलों के एक्सपर्ट रोबिंदर सचदेव से बातचीत
1971 की तोपों वाली जंग और आज के हाई‑टेक वॉरफेयर में कितना है अंतर? विजय दिवस पर पढ़ें BSF के पूर्व DIG से खास बातचीत
देशभक्ति का सही मतलब क्या है? विजय दिवस पर जानें Gen-Z के मन की बात
ग्लोबल प्रेशर के बावजूद दशकों से कैसे टिकी है भारत-रूस की दोस्ती? एक्सपर्ट ने समझाया एक-एक पहलू
जंग हो जाए तो आम नागरिक को क्या करना चाहिए? विजय दिवस पर BSF के पूर्व DIG ने बताया
Advertisement

India TV हिंदी न्यूज़ के साथ रहें हर दिन अपडेट, पाएं देश और दुनिया की हर बड़ी खबर। Explainers से जुड़ी लेटेस्ट खबरों के लिए अभी विज़िट करें।